अतीत …


मै चला था –
मंजिलों को हाथ मे ले कर.
नई उड़ान भर कर –
कुछ दूर उड़ा भी था.
फिर एक टक निहारा –
अतीत  को अपने!
जो ज़ुबां से खामोश,
एहसासों से जुदा भी था.

दिन रात कंकडों पर –
चला था जब,
कोई हाथ नहीं था –
साथ निभाने को.
यूही दिन गुज़ारता रहा,
गलियों औ बाज़ारों मे ..
वक़्त ही था मुकम्मल,
हाथ बढ़ाने को ..!

फिर भागमभाग शुरू हुई ज़िन्दगी की,
किसी से मुलाकात का वक़्त कहाँ था,
साथ खोजने की बात कौन करे अब,
अंतर्मन मे भी सुकूं कहाँ था.

मैंने सब दाव खेले,
कहीं जीता कहीं हारा,
हार को भूलता गया,
जीत मे जश्न घोलता गया.

अब एक टक फिर से निहारा अतीत मे,
जो अब जश्न बन चुका था.
जो अनंत को खोज रहा था.
जो सुकूं की जल तरंग मे.
अपनों को सोच रहा था.
वो कह रहा था.
भाग भाग कर भाग नहीं सवरता प्यारे.
भाग को कई भागों मे बाँट दे.
खुद का भाग निखर जायेगा,
वो चंद और कदम बढ़ आएगा !

मेरी बिटिया ..


कुछ  नया  सा  लगता  है ..
अब  दिन  सजा  हुवा  दिखता  है ..
मासूम  से  नन्हे  हाथ –
जब  खेलने  को  मचलते  हैं ..
मुस्कान  के  मीठे  राज़, कुछ –
कहने  को  संभलते  हैं.

मै  खुशनुमा  बहार  देख –
मन ही  मन  मचलता  हूँ ..
मेरी  बिटिया  की  मुस्कान  देख ,
मन  ही  मन  चेहेकता  हूँ ..

एक  परी  सी  है  मानो ..
या  एहसास  खुदा  का  है ..
एक  इबादत  सी  लगती  वो –
या  असर  दुवा  का  है.

कभी  रो  कर, कभी  हँस कर,
कभी  बंद  मुठ्ठी खोल  कर,
कभी  बिस्तर  से  लड़के –
ठंडी  हवा  के –
झोंको  से  मिलती  है.
कभी  मैय्या  को  देखे  दूर –
झूठी – मुठी  रो  भी  पड़ती  है.

उस  नन्ही  की  आँखों  से,
दुनिया  बड़ी  सी  दिखती  है.
उसकी  अनसुलझी  अंगड़ाइयों  से,
दुनिया  नई  सी  लगती  है.

उसको देख  लगता  है,
ज़िन्दगी  एसे  ही –
खुशनुमा  चलती  जायेगी.
उसको पा  के  लगता  है,
ज़िन्दगी  मेरे  मुताबिक  सवरती  जायेगी.

हर  दुवा  है  तुझे, बेटी !
ये  लम्हा,  जो  तुने  दिया  है,
तेरी  हर  मुस्कान  का  ख्याल , है  मुझे !
तेरे  हर  नए  मुकाम  का  ख्याल , है  मुझे !

सूरज का सामना..


चार  दिवारी  से  बहार  निकले,
तो  हवा  के छूने का एहसास  हुवा.
कुछ  चमक  सूरज  की –
आँखों  को  चका-चोंध करने  लगी.
आंखें  खुलने  से  पहले  ही   बंद  होती  दिखीं.

हम  फिर  से  छाँव ढूंढने  लगे,
किसी  मज़बूत  पेड़  की  आड़  मे  छुपने  लगे.
अचानक  किसी  ने  हाथ  थामा-
और  जोर  से  खीचा.
हम  फिर  से  सूरज  का  सामना  करने  लगे,

आंखें  टकराई  तो  देखा!
नई  सुबह  ने  हाथ  खीचा  था.
वो  मुस्कराकर  कह  रही  थी, पगले !
ये  ही  है  वो  ख़जाना, जिसको-
तूने अब  पाया  है.
घुटन  का  हर  वो  ज़माना,
जब  तू  मार  के  आया  है .

घबरा मत!  एक  टक  देखता  जा,
हर  चमक  तेरे  से  टकरा  कर –
खुद  झुक  जायेगी.
हर  मदहोश  हवा  तुझे  पाके  खुश  हो  जाएगी,

एक-दर-एक  सीढ़ियाँ चढ़ता  जा,
होसलों  को  और  बुलंद  करता  जा,
बेरोकटोक  बढ़ता  जा – क्यूंकि –
तुझे  सूरज  के  करीब  नहीं  पहुँचना-
खुद  सूरज  बनना  है.
फिर  किसी  के  लिए  तेज़  चमक  बनना  है.
हर वो,  जो  उस  पेड़  की  आड़  मे  खड़ा  रहेगा ?
तुझे  उसका  सामना  करना  है.

मैं तो  हर  रोज़  तुझे  यहीं  मिलूंगी,
तेरे  इंतजार  मे ,
नई  चेतना  बन  कर.
नया  एहसास  बन  कर.
नई  तमन्ना  बन  कर.

 

नए वर्ष की सभी को शुभकामनायें. इस नए वर्ष मे मैं चाहता हूँ हम सब आगे बढें…उन्नति करें..और सबको साथ लेके चलें…!

घुटन..


ये पंक्तियाँ भ्रस्टाचार के खिलाफ़ हर उस इंसान की आवाज़ है जो त्रस्त है हर रोज़ की ज़िन्दगी का सामना करते हुवे. जो चाहता है अच्छे जीवन को जीना…पर मजबूर हो गया है क्यूंकि सभी तरफ लूट मची हुई है. अब सिर्फ अंधकार ही दिखाई दे रहा है उसको दूर अनंत तक.

कभी मंजिल  मिलती  है,
कभी मरहम मिलता है,
कहीं जलवे  बिखरते  हैं,
कहीं सितम  बिकता  है.

घुट  के  जिए  सभी  अभी तक,
अब  क्यूँ  साँसे  लेते  हो,
न  छुपते  हो  न  कहते  कुछ,
न  ही इबादत  करते  हो.

यहाँ  कोई  नहीं  अपना,
जो  नई  राह  सुझाएगा,
हर  कोई  मतलब – परस्त , जो,
जहाँ  उठोगे  वहीँ  दफनायेगा.

कलम  से  कलाम  लिख  डाले,
फिर  सर  कलम  क्यूँ  हैं  सबके,
नई  बात  क्यूँ  सुने  कोई?
कौन  आंसू  पोछे  और  किसके?

गरीब  का  चूल्हा सूख़ गया  अब,
राख़ भी  सब  उसी  की  है,
वो  चाहे  तुम  रखो गिरवी,
सब  सौगात  उसी  की  है.

नया सूरज  देदो अब,
सारा आकाश ख़ाली है,
पीढ़ियों से मरता  रहा जो,
उसका आशियाँ ख़ाली है.

शायद  हवा  मे –
सांस  ले  सके  वो ..
शायद  हर  गुनाह तुम्हारा,
माफ़  कर  सके  वो ,
नई  आज़ादी   दे सके –
नई उम्मीद को अपनी,
शायद  कुछ  घुटन  कम  कर  सके –
अपने  हम – वतन  साथियों  की.

गरीबी ..


कभी  क़त्ल होता  है,
कभी  खून  बहता  है,
सियासतदारों  के  घर,
रोज़  जश्न  होता  है.

बेख़ौफ़  कोई  नहीं  इतना,
जो  सरपरस्त  बन  जाए,
इमानदारों  की  सियाही  मे –
अक्सर  दर्द  होता  है.

झुकी  हुई   हर  डाली,
पत्तों  को  तरसी  है,
सूखे  गुल्फामों  मे –
माली  भी तो रोता  है.

किसे  पकडें , किसे  रोकें,
यहाँ  हर  ज़ुल्म  तन्हा  है,
डूबी  हुई  किस्मत  पर,
साहिल  मिल  के भी  खोता  है,

मै  यादों  से  नहीं  गुज़रा  हूँ,
मै  सपनो  पर  नहीं  गरजा  हूँ,
आवाज़  गूंजे  तो कुछ  हो-
यहाँ  हर  शख्स सोता  है.
कहीं पर भूख रोती है,
कहीं पर मातम होता है.

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kabhi quatl hota hai
kabhi khun behta hai..
siyasatdaaron ke ghar
roz jashn hota hai.

bekhauf koi nahi itna..
jo serparast ban jaaye..
imandaron ki siyahi mai
aksar dard hota hai…

jhuki hui hr daali..
patton ko tarsi hai..
sukhe gulfamon mai..
maali bhi to rota hai..

kise pakdain, kise rokain..
yahan hr zulm tanha hai..
dubi hui kismat pr..
sahil mil ker bhi khota hai..

mai yadaon se nahi guzra hun
mai sapno pr nahi garja hun..
aawaz gunje tb kuch ho..
yahan hr sakhs sota hai..
kahin pr bhukh roti hai,
kahin pr maatam hota hai.