टैग्स

, ,


ek-bachpanछीन के लाने का मन है,
उन दिनों को जब हम !
साईकल के पहिए को –
दौड़ा दौड़ा के मारा करते थे।

छीन के लाने का मन है,
उन दिनों को जब हम !
रात भर टोर्च की रोशनी से –
चाँद को छुवा करते थे।

छीन के लाने का मन है,
उन दिनों को जब हम !
कांच के कंचों को-
रोज़ मिट्टी में दफ़नाया करते थे।

बचपन के दिन क्या जुदा हुए हमसे?
हम क़िस्मत में ख़ुशियाँ खोजने लगे,
हर दिन मशक्कत करने लगे,
हर दिन ज़िंदगी ढूँढने लगे।

अब दौड़ दौड़ कर चाँद को छूना चाहते हैं
लेकिन यह दौड़ कब दफ़न कर दे कौन जाने?
कौन जाने बचपन का मोल क्या था?

Advertisements