farmerपेड़ से लटक कर-
इंसानियत का क़त्ल हो जाता है।
कोई उसे लखपति तो –
कोई उसे सम्पन किसान बताता है।

कोई उसकी मौत से इस्तेहार बनाता है,
कोई फिर मंच से नई बिसात बिछाता है।

सब लग गए कारोबार में अपने !

खड़े खड़े सड़क पर एक इंसा का क़त्ल हो गया,
वो न जाने कितनो के लिए दाना पानी छोड़ गया,
एक सनसनी सी फिरा गया –
मरघट में फिर से,
कुछ मुर्दों को जगा गया फिर से,

अब कैमरे पकड़े कई पिसाच,
माँ को नोचेंगे उसकी,
फिर पिता को खंजर घोपेंगे बार बार,
उसके बेटे की मौत का तमाशा लिए तमाशबीन –
नये-नये करतब औ डुगडुग्गी बजायेंगे बार बार।
फिर किस्सा चलेगा कई और रात,
फिर से दफ़न हो जायेगें सारे आसूं,

ये मोल तो देना ही पड़ा है अब तक!

मुर्दों के देश में सब चलता है,
अनुमान अब अरमानों को कुचलता है।

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