Paper-Boats-Rain मेरी मन की चाह ने फिर मौज ली है,
फिर मेरे दिल ने दस्तावेज़ों को खंगाला है।
फिर से अंतर मन ने हुंकार दी है,
फिर से भावनाओं ने उम्मीदों को सम्भाला है।

एक टक मांझी की तरह किनारा ढूँढ़ रहा मैं,
जब कभी लहरों से टकराता हूँ!
सोचता हूँ दरिया पार कर पाउँगा,
उमड़ता हूँ छटपटाता हूँ।
फिर संजीदगी से सम्भलते हुए,
हाथ पैरों का तालमेल साधते हुए,
हर भार को समझते हुए आगे बढ़ता हूँ।
देखता क्या हूँ !
चंचल धारा अब कई छोरों से –
मुझसे मिलने आ रही है,
वो मेरे साथ बह जाना चाहती है,
सोचती हुई कि –
दरिया की कैद से उसको मैं बाहर निकालूंगा?
हर पल मगन हो मेरे साथ प्रफुल्लित होती है।

एक छण आता है जब-
दरिया का किनारा दीखता है मुझे,
और ठीक उसी के साथ जो घबराहट थी-
वो अब सहानभूति सी महसूस होती है।
उस धारा के लिए जिसने-
कहीं न कहीं मुझे बांध कर रखा,
सीख़ने में मशगूल रखा,

ज़िन्दगी के दाओपेंच-
सब नज़र आये उसके संग,
आख़िर इसी छटपटाहट से,
हमसब बंधे हैं,
किनारे की खोज में आगे
बढ़ते जाते हैं,
कभी आज़ादी को पाना चाहते है,
कभी आज़ाद हो कर भी-
बंधा रहना चाहते हैं।
क्यूंकि ज़िन्दगी सरल प्रवाह नहीं,
महस एक छटपटाहट है।

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