रुके समय सा ..
दिन ढले सा ..
आज एहसास ये जागा …
मै दौड़ के यूँही भागा ..

रोक रोक …
मझधार जगत की ..
अब जेब मे सूरज आधा ..
मै दौड़ के यूँही भागा ..

आस यही ..
विश्वास वही …
नए रोग का पकडे धागा ..
मै दौड़ के यूँही भागा ..

सुबह की रौनक …
शाम की फुर्सत …
और रंग ने दी दिलाशा …
मै दौड़ के यूँही भागा ..

हांफ गया ..
अब जान गया ..
सुख की नहीं कोई आशा ..
मै दौड़ के यूँही भागा ..

रोग लगा ..
और इश्क चढा ..
भूखा और था प्यासा …
मै दौड़ के यूँही भागा ..

थाम लिया ..
ये हाथ सभी ने ..
मोड़ दिया ..
हर जख्म सभी ने …
फिर हस्ते हस्ते जागा …
मै दौड़ के यूँही भागा ..

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