घुंगरू की छनक –
और मेरा मन,
एक साथ बजे आज..

फिर मैंने,
भोर का तारा भी देखा,
और मुल्ले की पहली-
अज़ान भी सुनी..

लगा किसी और युग में,
पहुँचा हूँ .
ख़ुदा को करीब से
जानने का मन किया.

गली के उस पार,
दूसरी तरफ ..
तवायफखाने में,
कुछ बच्चों की –
आवाज़ सुनी तभी.

घुंगरू की छनक-
अब बंद थी ..
एक पल को लगा, ख़ुदा –
करीब आ गया है शायद .
पर अगले ही पल,
उन मासूमों की चीख़ सुनाई दी,
लगा के उस नूर की दुनिया में,
सब थमता जा रहा है ..
न जाने क्यूँ ?
हवस से भरे पुजारियों का कारवां,
बढ़ता जा रहा है.

अब सोचता हूँ ,
कुछ नहीं रखा –
नई सुबह मे!
वो तो रात मे ही बिक गई ..
अब सिर्फ सोने मे ही ..
सबकी भलाई है.

Advertisements