कभी सुनता हूँ दस्तक-
उस प्रलय की,
घोर फिजाओं में!
कभी रोता हुवा ..
सूखे दरख्त को
निचोड़ता हूँ.

पल भर में अमानत,
खोजता हुवा सा,
दर दर भटकता हूँ.

दिन भर में सजावट-
देखता हुवा सा ..
मर मर कर हँसता हूँ.

यूँ तो बिखरा हुवा,
अतीत था,
आज फिर आइना देखता हूँ.

मदहोश हो गया समय,
का काँटा,
पागल हूँ मै-
फिर उसे खोजता हूँ.

देखो ज़माने को,
मेरे बिना बिलखता है,
मै करीब हूँ यादों मै सबकी,
बस यूँही सिमटता हूँ.

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