यादें बचपन की…

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ek-bachpanछीन के लाने का मन है,
उन दिनों को जब हम !
साईकल के पहिए को –
दौड़ा दौड़ा के मारा करते थे।

छीन के लाने का मन है,
उन दिनों को जब हम !
रात भर टोर्च की रोशनी से –
चाँद को छुवा करते थे।

छीन के लाने का मन है,
उन दिनों को जब हम !
कांच के कंचों को-
रोज़ मिट्टी में दफ़नाया करते थे।

बचपन के दिन क्या जुदा हुए हमसे?
हम क़िस्मत में ख़ुशियाँ खोजने लगे,
हर दिन मशक्कत करने लगे,
हर दिन ज़िंदगी ढूँढने लगे।

अब दौड़ दौड़ कर चाँद को छूना चाहते हैं
लेकिन यह दौड़ कब दफ़न कर दे कौन जाने?
कौन जाने बचपन का मोल क्या था?

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गुरुर

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maxresdefaultउठा गुरुर,
जला दिन भर,
कुढ़ा रातों में,
दुपक गया फिर –
या शायद मर गया.
वो ग़लतफहमी में –
ज़िन्दगी जी गया.
अब क्या फायदा!
दरवाजे सब बंद हुए,
बिसात के प्यादे –
मंद हुए.
लकीरे मिट गई सब,
सुना है उसकी –
सोहबत बिगड़ गई थी.

एक था किसान


farmerपेड़ से लटक कर-
इंसानियत का क़त्ल हो जाता है।
कोई उसे लखपति तो –
कोई उसे सम्पन किसान बताता है।

कोई उसकी मौत से इस्तेहार बनाता है,
कोई फिर मंच से नई बिसात बिछाता है।

सब लग गए कारोबार में अपने !

खड़े खड़े सड़क पर एक इंसा का क़त्ल हो गया,
वो न जाने कितनो के लिए दाना पानी छोड़ गया,
एक सनसनी सी फिरा गया –
मरघट में फिर से,
कुछ मुर्दों को जगा गया फिर से,

अब कैमरे पकड़े कई पिसाच,
माँ को नोचेंगे उसकी,
फिर पिता को खंजर घोपेंगे बार बार,
उसके बेटे की मौत का तमाशा लिए तमाशबीन –
नये-नये करतब औ डुगडुग्गी बजायेंगे बार बार।
फिर किस्सा चलेगा कई और रात,
फिर से दफ़न हो जायेगें सारे आसूं,

ये मोल तो देना ही पड़ा है अब तक!

मुर्दों के देश में सब चलता है,
अनुमान अब अरमानों को कुचलता है।

फिर खो जा…!


dreamबेजुबां ज़िन्दगी में खो जा,
ज़मीं के पहलुओं में खो जा,
चीटियों से बनते कारवां में खो जा,
चिड़ियों से उड़ते ख्वाबों में खो जा.

खो जा फिर हवाओं में,
चंद आँसुओं में खो जा,
बह जा फिर फ़िज़ाओं में,
कागज़ के पुर्रो में खो जा.
उसकी इबादत में खो जा,
उसकी चाहत में खो जा,
ऐ दिल! ख़फ़ा क्यूँ होता है?
एक नई-नवेली आरज़ू में खो जा.

सफर


Paper-Boats-Rain मेरी मन की चाह ने फिर मौज ली है,
फिर मेरे दिल ने दस्तावेज़ों को खंगाला है।
फिर से अंतर मन ने हुंकार दी है,
फिर से भावनाओं ने उम्मीदों को सम्भाला है।

एक टक मांझी की तरह किनारा ढूँढ़ रहा मैं,
जब कभी लहरों से टकराता हूँ!
सोचता हूँ दरिया पार कर पाउँगा,
उमड़ता हूँ छटपटाता हूँ।
फिर संजीदगी से सम्भलते हुए,
हाथ पैरों का तालमेल साधते हुए,
हर भार को समझते हुए आगे बढ़ता हूँ।
देखता क्या हूँ !
चंचल धारा अब कई छोरों से –
मुझसे मिलने आ रही है,
वो मेरे साथ बह जाना चाहती है,
सोचती हुई कि –
दरिया की कैद से उसको मैं बाहर निकालूंगा?
हर पल मगन हो मेरे साथ प्रफुल्लित होती है।

एक छण आता है जब-
दरिया का किनारा दीखता है मुझे,
और ठीक उसी के साथ जो घबराहट थी-
वो अब सहानभूति सी महसूस होती है।
उस धारा के लिए जिसने-
कहीं न कहीं मुझे बांध कर रखा,
सीख़ने में मशगूल रखा,

ज़िन्दगी के दाओपेंच-
सब नज़र आये उसके संग,
आख़िर इसी छटपटाहट से,
हमसब बंधे हैं,
किनारे की खोज में आगे
बढ़ते जाते हैं,
कभी आज़ादी को पाना चाहते है,
कभी आज़ाद हो कर भी-
बंधा रहना चाहते हैं।
क्यूंकि ज़िन्दगी सरल प्रवाह नहीं,
महस एक छटपटाहट है।