सूरज का सामना..
31 दिस 2011 3s टिप्पणियाँ
in Awareness
चार दिवारी से बहार निकले,
तो हवा के छूने का एहसास हुवा.
कुछ चमक सूरज की -
आँखों को चका-चोंध करने लगी.
आंखें खुलने से पहले ही बंद होती दिखीं.
हम फिर से छाँव ढूंढने लगे,
किसी मज़बूत पेड़ की आड़ मे छुपने लगे.
अचानक किसी ने हाथ थामा-
और जोर से खीचा.
हम फिर से सूरज का सामना करने लगे,
आंखें टकराई तो देखा!
नई सुबह ने हाथ खीचा था.
वो मुस्कराकर कह रही थी, पगले !
ये ही है वो ख़जाना, जिसको-
तूने अब पाया है.
घुटन का हर वो ज़माना,
जब तू मार के आया है .
घबरा मत! एक टक देखता जा,
हर चमक तेरे से टकरा कर -
खुद झुक जायेगी.
हर मदहोश हवा तुझे पाके खुश हो जाएगी,
एक-दर-एक सीढ़ियाँ चढ़ता जा,
होसलों को और बुलंद करता जा,
बेरोकटोक बढ़ता जा – क्यूंकि -
तुझे सूरज के करीब नहीं पहुँचना-
खुद सूरज बनना है.
फिर किसी के लिए तेज़ चमक बनना है.
हर वो, जो उस पेड़ की आड़ मे खड़ा रहेगा ?
तुझे उसका सामना करना है.
मैं तो हर रोज़ तुझे यहीं मिलूंगी,
तेरे इंतजार मे ,
नई चेतना बन कर.
नया एहसास बन कर.
नई तमन्ना बन कर.
नए वर्ष की सभी को शुभकामनायें. इस नए वर्ष मे मैं चाहता हूँ हम सब आगे बढें…उन्नति करें..और सबको साथ लेके चलें…!

दिस 31, 2011 @ 19:26:39
एक-दर-एक सीढ़ियाँ चढ़ता जा,
होसलों को और बुलंद करता जा,
बेरोकटोक बढ़ता जा – क्यूंकि -
तुझे सूरज के करीब नहीं पहुँचना-
खुद सूरज बनना है.
Marvelous! Superb!
जन 10, 2012 @ 21:21:41
Thanks Puneet…!
जन 10, 2012 @ 21:29:36
lovely…..:)