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हुनर

मेरी ये कविता मेरी पिछली रचना को ही पूरा करती है….ख्वाब का और हुनर का गहरा रिश्ता है ….अपने हुनर को निखारो ….फिर अरमान सजाओ…और फिर उनको पूरा होते देखो….पर ये इतना आसान नहीं जितना लगता है…कड़ी मेहनत , पोज़िटिव सोच और लगन से बढ़ना होगा…! मेरी रचना आपको कुछ मोटिवेट करेगी  ऐसी आशा है….
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बाँध दिए थे सब अरमां…
दूर किसी डाली से..
और कर दिया था हमला..
दुनिया के सख्त मिजाज़ पर..

वो सुबूत मांगती है….
कि मुझे क्या पता है…
या कुछ पता भी है…!

क्या मै किसी लायक हूँ…
क्या मेरी सोच मे-
नयापन है…
क्या मै तुरंत-
पैसा छापना जानता हूँ…
कितनी सच्चाई से-
झूठ बोल सकता हूँ..

मेरे हुनर पर कोई नहीं जाता..
नहीं चाहता है कोई..
कि मै हर वो काम करूँ …
जो कोई महसूस नहीं कर सकता ..
कोई बयां नहीं कर सकता..

लगता है अब
सही वक़्त आ गया है..
धीरे धीरे हुनर को -
उम्र मे शामिल करने का…

इत्र की खुशबू देने का,
खुद की आँखों के सामने-
खड़े होने का…
हर वो ख़ुशी ढूंढने का…
जिसकी तलाश मे अरमां सजाये थे..
जो अब भी डाली से बंधे हैं…

ये रचना उन नौजवानों के लिए लिखी मैंने ….जो सिर्फ ख़्वाबों की दुनिया मे रहते हैं….उसी मे अपना अच्छा बुरा सोचते हैं…उसी मे अपना भविष्य तय कर लेते हैं….जबकि सच मे कुछ नहीं कर रहे होते ….मैं चाहता हूँ कि वो ख्वाब देखें….क्यूंकि ख्वाब के बिना ज़िन्दगी मे आगे बढ़ना नामुमकिन है…लेकिन अपनी वर्तमान परिस्थितियों को जानते हुए….और अपनी छमताओं को और पक्का करते हुए आगे बढें…!!….ये रचना एक कोशिश है इस बात पर गौर कराने के लिए…!

तू खुश होता है कि नहीं,
पर तेरे ख्वाब बहुत हैं.
यादों की लड़ियों मे तेरे,
पिछले बीते साल बहुत हैं.

मैं सोचता था हवा का पहलु-
किस तरफ है!
पर जहाँ भी देखो -
आरजू के सवाल बहुत हैं.

कभी खिलखिलाती धूप मे -
सूरज से लड़ता!
तो कभी जगमगाती रौशनी के -
घावों से डरता.

शख्स हर कोई अपनी -
अनोखी शख्सियत है रखता.
पर तेरे वजूद के सिक्के -
बेमिसाल बहुत हैं.

क्या फर्क पड़ गया जो लगा-
एक कदम हूँ लडखडाया.
क्यूँ तर्क देना खुद को!
क्या खोया और क्या पाया.

ये प्यार की दुनिया है,
जो सिर्फ प्यार से चलती है.
ये आशाओं की पतवार भी है,
जो सिर्फ आसार से चलती है.

लिखता लिखता मैं,
जाने कहाँ पहुँच गया.
सुनता सुनता तू,
फिर नए ख्वाब को बुन गया.

तेरी ये अदा अब -
सिर्फ तू ही जाने,
लेकिन तेरी इस अदा पर -
बवाल बहुत हैं.

babyएक  हासिल  और  लगा  के,
ज़िन्दगी  को  दुगुना करते  हैं.
वो  खामोशियों  का  चैन  चुरा  के,
शोर  शराबा  करते  हैं.

न  दर्द  से  रोते  हैं,
न  खूं  से  डरते  हैं,
वो  अपने  कारनामों  का -
इश्तिहार  शहर मे  करते  हैं.

ठगा  सा  मै,
ठगी  है  उसकी  दुनिया,
ठगे  खुदा  जब,
तो  मौत  से  पर्दा  करते  हैं …

न  मंज़र  है  अब-
कहीं  न  हरियाली  दिखती,
वो  जंगलों  मे  जाके,
रोज़ा  नमाज़  करते  हैं …

खफा  नहीं  मै -
बस  तरस  सा  आता  है,
वो  मेरी  बेबसी  को,
नज़रंदाज़  करते  हैं.

मौला – ओ – मौला,
मदद  कर  अब  मेरी.
तेरे  इश्क  का  रुतबा-
ज़रा  इन  दरिंदो  को  भी  दिखा!
दिखा  दे  इनको  कि  मै -
तेरी  पनाह  मै  अभी  भी  सुकूं से  हूँ …!

फ़रेब…

tearsये रचना मेरे कॉलेज के दिनों की है. जब दिल टूटने का सिलसिला हर रोज़ चला करता था. तो हम कुछ यारों का दिल ए़सी शाएरी से बहला करता था. मस्त थी सारी शामें …जो दोस्तों के साथ बीता करती थीं उस समय….सही कहते हैं कॉलेज के दिन वापस नहीं आते..!

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प्यार के पैमाने पर,
ये हिचकियाँ कैसी,
सूखे उजडे बागों मे,
ये खिलती कलियाँ कैसी.

मैंने अपना बिछोना-
आकाश तले लगाया था,
मेरे इस बिछोने मे -
सिलवटों की गलियां कैसी.

मैं तुम्हारे शहर मे,
ढूढ़ने तुमको निकला था,
मगर बाज़ारों मे ये-
इंतकाम की आंधियां कैसी.

तुम्हारे हुस्न-ओ-शाएरी का-
चर्चा-ए-आम था,
तुम्हारी नज़्म के शेरो मे आज!
ये गलतियाँ कैसी.

मेरे हाथों की लकीरों मे,
तुम्हारा ही नाम था.
तुम्हारे इन हाथों मे,
गैर की चूडियाँ कैसी,

तुम्हारी नज़रों की चमक ने,
सब कुछ कह डाला था,
हमारे ग़म की राहों मे,
अब खामोश सिसकियाँ कैसी.

जला दिए सब ख़त,
जो तुमने हमे भेजे थे,
अब तो सिर्फ मातम ही है,
झूठी रुदालियाँ कैसी.

thunderstormचारों तरफ आग लगी है,
आग ही आग, आग ही आग.
सेहरा मे आग,
सागर की लहरों मे आग.
आज हवा मे भी चिंगारी सुलग रही है.
आज दरख्तों पर भी लपटें पनप रहीं हैं.
मन खुश हुआ, बेहद खुश,
हमने दीपक जलाकर- सूनापन दूर किया था,
पर आज तो दुनिया जहां मे -
आग लगी हुई है.
आज हमारी आशाओं से -
कफ़न भी काफूर हो गया,
हमारा खूं भी जलती-
लपटों से गरम हो गया.
अब हमें सूरज की-
गुलामी नहीं चाहिए,
हमारे पास जलती -
चिताओं का उजाला है.
रौशनी की बात न करो हमसे,
इंसानियत की राख पर-
गौर करो ढंग से!
बेवक्त सावन को क्यूँ-
तड़पाते हो!
अब तो प्यार को-
चूल्हे पर नवाजा है.

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